नई दिल्ली /द्रष्टा डेस्क। जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के पूर्व चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालियापन (पर्सनल इन्सॉल्वेंसी) मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने 1 सितम्बर 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 25 अगस्त 2026 को एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को लगभग ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले मात्र ₹6.25 करोड़ चुकाने की अनुमति दी गई थी। NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने उस आदेश पर रोक लगाते हुए पीठ ने चंद्रा को अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेचने, या हस्तांतरित करने से रोक दिया है।
यह मामला भारतीय दिवालियापन कानून (IBC) के तहत व्यक्तिगत गारंटर की देनदारी, क्रेडिटर्स के बहुमत के अधिकार, हेयरकट की सीमा और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता जैसे कई संवेदनशील मुद्दों को उजागर करता है।
कैसे शुरू हुआ मामला?
सुभाष चंद्रा एस्सेल ग्रुप के संस्थापक हैं, जिसके तहत मीडिया (Zee), इन्फ्रास्ट्रक्चर, पैकेजिंग और अन्य व्यवसाय शामिल रहे। 2019 के आसपास ग्रुप में एसेट-लायबिलिटी मिसमैच के कारण वित्तीय संकट गहराया। ग्रुप की कुल उधारी लगभग ₹45,000 करोड़ बताई जाती है, जिसमें से सुभाष चंद्रा के अनुसार लगभग ₹43,000 करोड़ चुकाए जा चुके हैं, जबकि कुछ राशि अटकी हुई है।
यह व्यक्तिगत दिवालियापन मामला मुख्य रूप से पर्सनल गारंटी से जुड़ा है, न कि सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिए गए ऋण से। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (अब सम्मान कैपिटल) ने 2022 में विवेक इन्फ्राकॉन को दिए गए ऋण की डिफॉल्ट पर चंद्रा के खिलाफ याचिका दायर की। मामला 2024 में स्वीकार किया गया। अन्य लेनदार भी शामिल हो गए। स्वीकृत दावे लगभग ₹22,006.57 करोड़ बताए गए।
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चंद्रा का पक्ष –
उनका व्यक्तिगत उधार शून्य है।
₹22,000 करोड़ के आसपास की राशि व्यक्तिगत गारंटियों से संबंधित है।
इनमें से केवल कुछ (लगभग ₹2,500–4,800 करोड़ के आसपास) मूल उधार के समय दी गई गारंटियां थीं। बाकी डिफॉल्ट के बाद अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में दी गईं।
आपत्ति करने वाले लेनदारों के दावे उन्होंने लगभग ₹3,992 करोड़ बताए, जिनमें से कुछ पहले ही निपटाए जा चुके हैं।
योजना के तहत चंद्रा व्यक्तिगत संपत्ति से ₹6.25 करोड़ देने वाले थे, जबकि मुख्य उधारकर्ता कंपनियां लगभग ₹1,494 करोड़ चुकाने वाली थीं। यह चंद्रा की व्यक्तिगत देनदारी पर लगभग 99.97% हेयरकट के बराबर था।
ऋण माफी/पुनर्भुगतान योजना की मंजूरी प्रक्रिया
क्रेडिटर्स की कमेटी (CoC) में वोटिंग (नवंबर 2024) में योजना को 80.814% वोटिंग शेयर का समर्थन मिला है। कुल वोटिंग शेयर के हिसाब से लगभग 77.48% पक्ष में, 18.42% विरोध में थे।
विरोध करने वालों में HDFC बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस, कैनरा बैंक, यूनियन बैंक, Axis बैंक, RBL बैंक आदि प्रमुख थे। LIC HFL का स्वीकृत दावा लगभग ₹1,322 करोड़ था, जबकि योजना में उन्हें मात्र लगभग ₹38 लाख मिलने थे।
मूल दो सदस्यीय पीठ न्यायायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनिकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी में मतभेद हुआ।
तीसरे न्यायायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने 25 अगस्त 2026 को 144 पन्नों के आदेश में योजना को मंजूरी दी। उन्होंने तर्क दिया कि RP के मूल्यांकन के अनुसार चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति योजना राशि से कम है, और अस्वीकृति से दिवालियापन का जोखिम बढ़ेगा तथा रिकवरी और कम हो सकती है। ट्रिब्यूनल का काम क्रेडिटर्स के वाणिज्यिक निर्णय को बदलना नहीं है।
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NCLT की पांच सदस्यीय पीठ द्वारा रोक
NCLT प्रेसिडेंट जस्टिस (रिटायर्ड) अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय विशेष पीठ जिसमें न्यायायिक सदस्य बच्चू वेंकट बलराम दास, महेंद्र खंडेलवाल ,तकनिकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी, रविंद्र चतुर्वेदी ने पाया कि कम्पनीज Act 2013 की धारा 419(5) के तहत पहले के तीन सदस्यों की राय में स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया। इसलिए 25 अगस्त के आदेश पर रोक लगा दी गई।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विरोध करने वाले क्रेडिटर्स की ओर से तर्क दिया कि अगर गारंटर संपत्ति बेच दे तो मामले का आधार खत्म हो जाएगा। पीठ ने सुभाष चंद्रा को किसी भी संपत्ति के हस्तांतरण से रोक दिया और सभी पक्षों को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 23 सितंबर 2026 के आसपास तय हुई, जिसमें विस्तृत सुनवाई का आश्वासन दिया गया।
सुभाष चंद्रा और समर्थकों का पक्ष-
यह व्यक्तिगत उधार की माफी नहीं, बल्कि गारंटर की सीमित देनदारी का निपटारा है।
मुख्य उधारकर्ता अभी भी उत्तरदायी हैं।
ग्रुप ने ज्यादातर कर्ज चुकाया, शेष के लिए उधारकर्ता कंपनियां बातचीत कर रही हैं।
स्वतंत्र ऑडिट की मांग की गई ताकि सच्चाई सामने आए।
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मूल्यांकन और प्रक्रिया पर सवाल
विरोध करने वाले लेनदार जो मुख्य रूप से सार्वजनिक वित्तीय संस्थान हैं। उनका मूल्यांकन और प्रक्रिया पर सवाल करते हुए कहना है कि योजना “अव्यवहारिक और गैरकानूनी” है। संबंधित पार्टियों के वोट से बहुमत हासिल किया गया हो सकता है। कई लेनदारों ने NCLAT में अपील की तैयारी कर दी है।
IBC के तहत व्यक्तिगत गारंटर मामलों में CoC के बहुमत की शक्ति बनाम अल्पसंख्यक (खासकर सार्वजनिक बैंकों) के हितों का संतुलन नहीं है। क्या 99%+ हेयरकट स्वीकार्य है जब व्यक्तिगत संपत्ति सीमित हो? मतभेद होने पर बड़े बेंच का गठन किया गया। मीडिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया में कुछ ने इसे “मुंडन” कहा, जबकि तथ्यों के अनुसार यह पूर्ण ऋण माफी नहीं है।
अब क्या होगा?
मामला अब पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष नए सिरे से सुना जाएगा। संपत्ति पर रोक जारी रहेगी। क्रेडिटर्स NCLAT का रुख भी अपना सकते हैं। सुभाष चंद्रा पक्ष ग्रुप कंपनियों से शेष बकाया निपटाने पर जोर दे रहा है। यह मामला भारतीय दिवालियापन व्यवस्था की परिपक्वता, बड़े प्रमोटर्स की व्यक्तिगत देनदारी और बैंकिंग सिस्टम की रिकवरी क्षमता पर महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है। अंतिम फैसला आने तक स्थिति फ्लूइड बनी रहेगी।


