ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: केंद्र सरकार कर रही थी बेशर्मी कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिया उचित ज्ञान

अदालत ने कहा कि यदि गरीब, असहाय या कमजोर समुदाय अदालत तक नहीं पहुंच सकते, तो कोई भी जागरूक नागरिक उनकी ओर से न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। और नसीहत देते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस बेशर्मी भरे आपत्ति को खारिज कर दिया।

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वन अधिकार कानून उल्लंघन के आरोपों वाली PIL सुनवाई योग्य, आदिवासी ‘बेहद संवेदनशील’ समुदाय – हाईकोर्ट

द्रष्टा /डेस्क। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। राक्षसी प्रवृती की नौकरशाही, राजनेता और पूंजीवादी कारपोरेट संस्कृति के गठजोड़ पर्यावरण को तबाह बर्बाद करने पर तुला हुआ है। जो भी इनके रास्ते में व्यक्ति समाज आ रहा है उसे कुचलने के लिए मीडिया से लेकर कोर्ट तक बेशर्मी के साथ नंगे खड़े हो जा रहे हैं। दिल्ली की अरावली, उत्तराखंड, मणिपुर छत्तीसगढ़ सहित भारत के कोने -कोने में जंगल और पहाड़ियों का बेदर्दी से विनाश कर रहे हैं।
निकोबार द्वीप के हरे भरे जंगल और पहाड़ियों पर विदेशी पूंजीवादियों की पैनी नज़र है। विपक्ष नेता राहुल गाँधी ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को रोकने की अपील भी कर चुके हैं। इस बीच कलकत्ता हाईकोर्ट ने ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े वन अधिकार कानून के कथित उल्लंघनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को सुनवाई योग्य माना है।
केंद्र सरकार की बेशर्मी भरा उत्तर
रिटायर्ड IAS अधिकारी मीना गुप्ता द्वारा दायर तीन PIL (जनहित याचिका ) कर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, वन अधिकार अधिनियम 2006 के कथित उल्लंघन और राष्ट्रीय उद्यानों के इको-सेंसिटिव बफर जोन कम करने को लेकर केंद्र सरकार को चुनौती दी है। इस चुनौती का बेशर्मी भरा उत्तर देते हुए केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता हैदराबाद की निवासी हैं और उनका अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। जबकि एक वकील जो सरकार का पक्ष रखता हो उसे पता होना चाहिए कि भारत एक गणराज्य है और यहां का नागरिक अखिल भारतीय नागरिकता रखता है। और यहां का नागरिक भारत में रहने वाले किसी भी पर्यावरण ,व्यक्ति और समाज को न्याय दिलाने के लिए कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सकता है।
चीफ़ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने कहा कि PIL में लोकस स्टैंडी (locus standi) को लेकर कोई “सख्त नियम” नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि यदि गरीब, असहाय या कमजोर समुदाय अदालत तक नहीं पहुंच सकते, तो कोई भी जागरूक नागरिक उनकी ओर से न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। और नसीहत देते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस बेशर्मी भरे आपत्ति को खारिज कर दिया।

मामला रिटायर्ड IAS अधिकारी मीना गुप्ता द्वारा दायर तीन PIL (जनहित याचिका ) से जुड़ा है, जिनमें ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, वन अधिकार अधिनियम 2006 के कथित उल्लंघन और राष्ट्रीय उद्यानों के इको-सेंसिटिव बफर जोन कम करने को चुनौती दी गई है। केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि यह ₹72,000 करोड़ की राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है, जिसमें बंदरगाह, एयरपोर्ट, पावर स्टेशन और रक्षा सुविधाएं शामिल हैं। सरकार ने यह भी कहा कि जिन जनजातीय समुदायों के हितों की बात की जा रही है, वे खुद अदालत में पक्षकार नहीं हैं।

केंद्र सरकार की नियत –
पूंजीवादी कारपोरेट के इशारों पर केंद्र सरकार ने कई कानूनों में संशोधन कर असंवैधानिक कानूनों को लागू किया है। वन संरक्षण अधिनियम -2023 कानून इसी प्रकार का असंवैधानिक कानून है जो ग्राम सभा के अधिकारों का हनन करता है। वानिकी, वन संरक्षण ग्राम सभा के अधिकार क्षेत्र में है। परन्तु सत्ता और कारपोरेट का गठजोड़ कुछ पूंजीपतियों को लाभान्वित करने के लिए वन संरक्षण अधिनियम -2006 को संशोधित कर ग्राम सभा की आपत्ति के अधिकार को ख़त्म कर दिया। इससे केंद्र सरकार की पर्यावरण के प्रति नियत स्पष्ट प्रदर्शित होती है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि परियोजना चाहे कितनी भी बड़ी या महत्वपूर्ण क्यों न हो, वह न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी माना कि अंडमान-निकोबार की जनजातियां बेहद संवेदनशील और कमजोर समूह हैं, जो सामान्यतः अदालत तक पहुंचने की स्थिति में नहीं होतीं। कोर्ट ने मामले को अंतिम सुनवाई के लिए 23 जून 2026 को सूचीबद्ध किया है।

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