नई दिल्ली /द्रष्टा डेस्क। जेन जी का दूसरे दिन (11 अक्टूबर ) भी वोट चोर चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन जारी रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवमानना करते हुए दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। पुलिस ने सड़क छाप गुंडों के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों को सत्ताधीशों का डर दिखते रहे। सरकार के समर्थन में खड़े गुंडों ने कई प्रदर्शनकारियों को भी पीटा। प्रदर्शनकारियों ने भी इंक़लाब जिंदाबाद के नारों के साथ गुंडों को खदेड़ा।
इससे पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने CJP लीडर अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को रविवार सुबह करीब 10 बजे रिहा करने का आदेश दिया। तीनों को शनिवार सुबह फ्लाइट से ही हिरासत में ले लिया गया था। करीब 23 घंटे हिरासत में रहने के बाद रविवार सुबह 10 बजे रिहा किया गया। इसके बाद दीपके नागपुर अपने घर रवाना हो गए।
मशहूर यू ट्यूबर ध्रुव राठी को भी पुलिस ने रात को छोड़ दिया। ध्रुव राठी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस गुंडों की तरह उनके घर में घुसकर उनका अपहरण की। पुलिस ने कानून नियमों का पालन नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पुचकारते हुए दिया निर्देश
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो-ट्रेन सेवाएं बंद करने, इंटरनेट बाधित करने और लोगों को हिरासत में लेने से जुड़ी याचिकाओं पर रविवार को सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने सुनवाई की। विशेष सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पुचकारते हुए निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा तय प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाएगा।
यह निर्देश खासकर उन शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के जमावड़े के संबंध में है, जो उन इलाकों से बाहर हैं जहाँ निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) लागू है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट के आसपास के इलाके में BNSS की धारा 163 लागू करने से संबंधित बोर्ड को हटा दें। ऐसा इसलिए ताकि न्याय तक पहुँचने को लेकर कोई आशंका न रहे।
कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएँ सामान्य रूप से चलनी चाहिए, सिवाय तब जब संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी को देखते हुए प्रतिबंध लगाना ज़रूरी हो। लोगों की आवाजाही के बारे में कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रैफिक नियमों के अधीन शहर में लोगों की स्वतंत्र आवाजाही की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक की अन्य स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेड्स लगाने के फैसले की तुरंत समीक्षा की जाए।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इंटरनेट सेवाएं बिना किसी रुकावट के जारी रहनी चाहिए। कोर्ट ने SGI तुषार मेहता के इस आश्वासन पर ध्यान दिया कि मेट्रो रेलवे पूरी तरह से काम कर रही है, कल (शनिवार) रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हैं, ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं और इंटरनेट कनेक्शन भी बहाल कर दिया गया।
कोर्ट ने शुक्रवार को पारित उस आदेश का भी ज़िक्र किया, जिसमें संबंधित अधिकारियों को दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने के पिछले नोटिफिकेशन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया। यह निर्देश इस बात को ध्यान में रखते हुए दिया गया कि मेट्रो और रेल सेवाओं के संचालन को नियंत्रित तो किया जा सकता है, लेकिन उचित मामलों में उन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए।
उस आदेश में अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे पुनर्विचार के बाद लिए गए फैसले को सार्वजनिक करें ताकि आगे कोई असुविधा न हो। पक्षों की दलीलें सुनने और अवमानना याचिका में कही गई बातों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने कथित अवमानना करने वालों को नोटिस जारी किया। उन्हें अवमानना याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करने और ऊपर बताए गए आदेश के अनुसार अनुपालन रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया।
सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि कल (शनिवार) विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी बेरहमी से मारपीट की गई। उन्होंने कहा, “सवाल सिर्फ़ वकीलों का नहीं है। वकील होने के नाते हमारे पास कोई खास अधिकार नहीं हैं। कल शहर में हालात बहुत दमनकारी थे। लोगों को वहां खड़े भी नहीं होने दिया जा रहा था। मुझे उठाकर एक चलती हुई बस में फेंक दिया गया। यह नागरिकों के विरोध करने के अधिकार का मामला है। मुझे जो महसूस हुआ – कल हम ‘पुलिस स्टेट’ बनने से बस एक कदम दूर थे। कृपया राजधानी में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को बहाल करें। कल उस अधिकार को खत्म कर दिया गया।
” सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने कहा कि हालात ऐसे हैं कि प्रैक्टिस करने वाले वकील शहर में घूम नहीं सकते और तस्वीरें खुद सब कुछ बयां कर रही हैं। सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कई वीडियो का ज़िक्र किया और कहा कि जब वह बोल रहे थे, तब भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर BNSS की धारा 163 लागू कर दी गई। यह चौंकाने वाला है। जिस तरह की हिंसा हो रही है – यह आनुपातिकता का सवाल भी नहीं है। सबसे पहले ज़रूरत देखी जानी चाहिए। निहत्थे बच्चों को पीटना, लात मारना… उनके साथ बिना वजह हाथापाई करना। हमें कई वीडियो मिल रहे हैं – ये लोग इसे बहादुरी के बैज की तरह दिखाते हैं। इस घटना ने हमारे मन में कई भावनाएं जगा दी हैं। यह हमारे दरवाज़े तक आ गई।”
CJP मार्च – ‘कानून व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी’, सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से किया इनकार
याचिकाएं –
सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर 2 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने इस पर सुनवाई की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रखा। वहीं, एडवोकेट कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े, शोएब आलम और शादान फरासत ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा।
सुनवाई की प्रमुख बातें –
-कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शनकारियों को तय जगह तक पहुंचने से रोका गया। जस्टिस बागची ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून के दायरे में होना चाहिए।
-शोएब आलम ने कहा कि लोगों को प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस बागची ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों को पूरी तरह रोक दिया जाए।
– वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि याचिका केवल कुछ नेताओं या सांसदों की हिरासत तक सीमित नहीं है। यह दिल्ली में कथित तौर पर हिरासत में लिए गए करीब 7,000 लोगों और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है। मामला संविधान के संरक्षण से जुड़ा है।
-शोएब आलम ने आरोप लगाया कि लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए दिल्ली के बाहर से आने वालों को भी हिरासत में लिया गया। कुछ लोगों के घरों पर छापे मारे गए। कई लोगों को 24 घंटे से कम समय में छोड़ दिया गया, लेकिन इस तरह हिरासत में लेने के औचित्य पर सवाल है। ये याचिकाकर्ताओं के आरोप थे।
– वकीलों ने आरोप लगाया कि कुछ पुलिसकर्मी बिना नेम बैज के थे और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया। जस्टिस बागची ने कहा कि कानून के तहत अधिकारियों की जिम्मेदारियों के उल्लंघन और बल प्रयोग के आरोपों की जांच होगी। कानून-व्यवस्था के नाम पर पुलिस को नागरिकों के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
– केंद्र सरकार की ओर से मेहता ने कहा कि सभी मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं तथा इंटरनेट सेवा बहाल हो चुकी है। उन्होंने बताया कि 303 में से 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए थे, लेकिन शनिवार रात 10 बजे तक सभी स्टेशन खोल दिए गए थे।
– वकीलों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 लागू होने के बोर्ड लगे थे और बैरिकेडिंग के कारण अदालत तक पहुंचने में परेशानी हो रही थी। मेहता ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी लेकर बताना होगा। जस्टिस बागची ने कहा कि यदि वकीलों को प्रतिबंधों की जानकारी ही नहीं दी गई, तो यह आदेश को चुनौती देने का आधार हो सकता है। कोर्ट ने बोर्ड हटाने का निर्देश दिया।
– एक वकील ने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के बजाय उनके मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं। फोन में संवेदनशील जानकारी होने की बात उठाते हुए उन्हें लौटाने की मांग की गई। कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए आवेदन दाखिल करने को कहा।
– जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दायित्व है कि अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को रोके। जस्टिस वी. मोहना ने भी प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण रहने और उकसावे से बचने की अपील की। कोर्ट ने अधिकारियों को कथित हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर जवाब देने का निर्देश दिया। सभी संबंधित मामलों पर मंगलवार को एक साथ सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को क्या कहा था ?
आम लोगों की सुविधा- आम नागरिकों को बेवजह परेशानी नहीं होनी चाहिए, हम बस इतना ही चाहते हैं।
सुरक्षा बनाम अधिकार -रेलवे और मेट्रो स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे हैं और सरकार के पास सुरक्षा के दूसरे साधन भी हैं। आप उनका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन आम नागरिकों को भी स्टेशनों पर जाने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने का पूरा हक है।
सख्त टिप्पणी- “क्या आप मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करेंगे?”
प्रदर्शन स्थल- जंतर-मंतर बहुत छोटी जगह है, प्रदर्शन के लिए किसी बड़ी जगह पर विचार किया जाना चाहिए।


