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‘ ग्राम न्यायालय ‘ की स्थापना में हो रही बाधा को खत्म करने का समय- drashtanews

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रविकांत सिंह ‘द्रष्टा’

-”करूणा एवं दया की भावना और नागरिकों की समस्याओं का समाधान ही लंबे समय तक न्यायिक संस्थाओं को टिका कर रखेगा ” – न्यायमूर्ति डी. वाई. चन्द्रचूड़

सभ्य व्यक्ति वही हो सकता है जो न्याय के साथ जीवन जीता हो। सत्य, अहिंसा, धैर्य, त्याग, समर्पण और न्याय मानव धर्म के प्रमुख आधार हैं। न्याय करना और न्याय पाना मानव समाज की आत्मा है। न्याय विहीन समाज को मानव समाज नहीं कहा जा सकता है। मानव को सभ्य बने हजारों साल बीत चुके हैं। लेकिन न्याय की समझ अब भी सीमित है। व्यक्ति अब भी सामाजिक मूल्यों से अधिक स्वयं के स्वार्थ को अधिक महत्व देता है। न्याय की परिभाषा बदलने की चालाकी व्यक्ति में दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। संसद द्वारा पारित ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ के तहत नागरिकों को ‘घर पर न्याय’ प्रदान करने के लिए जमीनी स्तर पर ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना के लिए प्रावधान बना लेकिन, अभी तक राज्य सरकारों की प्राथमिकता से यह कोसों दूर है।

लंबित मुकदमें निपटाने में 324 साल से अधिक समय लग सकता है-

भारत में एक आंकड़े के अनुसार 2022 में देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमें लंबित हैं। जिसमें जिला और उच्च न्यायालयों में 30 से भी अधिक वर्षों से लंबित 169,000 मामले शामिल हैं। 4दिसंबर 2022 तक 5 करोड़ मामलों में से 4.3 करोड़ यानी 85% से अधिक मामले सिर्फ जिला न्यायालयों में लंबित हैं।

इन मुकदमों का निपटारा करने के लिए न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अभय एस ओका ने कहा कि भारत में प्रत्येक 10 लाख की आबादी पर 50 न्यायाधीशों की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में यह आंकड़ा प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 21 है।  जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है।

नीति आयोग की रिपोर्ट

कई न्यायाधीशों और सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि भारतीय न्यायपालिका के समक्ष लंबित मामलों की चुनौती सबसे बड़ी है। 2018 के नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारी अदालतों में मामलों को तत्कालीन दर पर निपटाने में 324 साल से अधिक समय लगेगा। जबकि उस समय (2018) में 2.9 करोड़ मामले कोर्ट में लंबित थे।

अदालतों में देरी होने से पीड़ित और आरोपी दोनों को न्याय दिलाने में देरी होती है। अप्रैल 2022 में बिहार राज्य की एक अदालत ने 28 साल जेल में बिताने के बाद, सबूतों के अभाव में, हत्या के एक आरोपी को बरी कर दिया। उसे 28 साल की उम्र में गिरफ्तार किया गया था, 58 साल की उम्र में रिहा किया गया।

मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने कहा है कि ‘‘कानून न्याय का जरिया हो सकता है, लेकिन कानून उत्पीड़न का औजार भी हो सकता है।’’ हम जानते हैं कि ‘‘औपनिवेशिक काल में इसी कानून का, जो आज कानून की किताबों में मौजूद है, उत्पीड़न के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।’’ उन्होंने कहा था, ‘‘इसलिए, नागरिक के तौर हम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि कानून न्याय का जरिया बने और उत्पीड़न का औजार नहीं बने।’’ मुझे लगता है कि उपाय ऐसा होना चाहिए, जिसमें सभी निर्णयकर्ता शामिल हों, न कि महज न्यायाधीश।

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अधिकतर लोग मौन रहकर पीड़ा सहते रहते हैं

इनसे पहले 30जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने न्याय तक पहुंच को ‘सामाजिक उद्धार का उपकरण’ बताते हुए कहा था कि ‘‘न्याय- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक – न्याय की इसी सोच का वादा हमारे संविधान की प्रस्तावना प्रत्येक भारतीय से करती है। वास्तविकता यह है कि आज हमारी आबादी का केवल एक छोटा हिस्सा ही न्याय देने वाली प्रणाली से जरूरत पड़ने पर संपर्क कर सकती है। जागरूकता और आवश्यक साधनों की कमी के कारण अधिकतर लोग मौन रहकर पीड़ा सहते रहते हैं।

न्याय न मिलने के कारण सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक अधिकारों से वंचित अनेकानेक व्यक्तियों की पीड़ा को द्रष्टा  महसूस करता है। संवैधानिक अधिकारों को उच्च पदस्थ, राजनेता, अधिकारी किस प्रकार कुचलते हैं इसे आम आवाम प्रतिपल झेलती है। ग्राम पंचायतों के संवैधानिक अधिकारों का हनन राज्य सरकारें करती रही हैं। और ग्राम न्यायालय की स्थापना अब तक जो आगे नहीं बढ़ा यह भी इसी साजिश का हिस्सा है।

‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना

वर्ष 1986 में 114वें विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ग्राम न्यायलय की अवधारण प्रस्तुत करते हुए ग्राम पंचायत स्तर पर ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना की सिफारिश की। समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए राज्यसभा में 15 मई, 2007 को ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम’का मसौदा प्रस्तुत किया गया।

देश के आम नागरिकों तक न्याय व्यवस्था की पहुँच को बढ़ाने और प्रत्येक नागरिक को देश के न्यायिक तंत्र से जोड़ने के लिये ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ के तहत ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। यह कानून 2 अक्तूबर, 2009 को लागू किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों को ग्राम पंचायत स्तर पर ‘ग्राम न्यायलयों’ की स्थापना करने के निर्देश दिये गए हैं । जिससे पंचायत स्तर पर दीवानी या फौजदारी के सामान्य मामलों (अधिकतम सजा 2 वर्ष) में सुनवाई कर नागरिकों को त्वरित न्याय उपलब्ध कराया जा सके। इस व्यवस्था को लागू करने का मुख्य उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे नागरिकों को स्थानीय स्तर पर संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से न्याय उपलब्ध कराना था।

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भारतीय संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 39 (क) में राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि –

राज्य का विधि तंत्र इस तरह से काम करे जिससे सभी नागरिकों के लिये न्याय प्राप्त करने का समान अवसर उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही राज्यों को उपयुक्त विधानों, योजनाओं या किसी अन्य माध्यम से नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान करने हेतु व्यवस्था करनी चाहिये। जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्य कारण से न्याय प्राप्त करने से वंचित न रहे।

ध्यातव्य है कि देश की स्वतंत्रता से पूर्व ‘द तमिलनाडु विलेज कोर्ट्स एक्ट-1888’ के माध्यम से भी पंचायत स्तर पर कुछ इसी तरह की व्यवस्था को वैधानिकता प्रदान करने का प्रयास किया गया था। वर्तमान में देश के कुल 9 राज्यों में मात्र 208 ग्राम न्यायालय ही कार्यरत हैं। जबकि केंद्र सरकार की 12वीं पंचवर्षीय योजना में देशभर में ऐसे 2500 ग्राम न्यायालयों को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया था।

सत्ताधीशों की प्राथमिकता में नहीं है नागरिकों के लिए न्याय

संसद द्वारा पारित ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ के तहत नागरिकों को ‘घर पर न्याय’ प्रदान करने के लिए जमीनी स्तर पर ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना के लिए प्रावधान किया गया था। वर्ष 2019 में दायर एक याचिका में शीर्ष अदालत की देखरेख में ग्राम न्यायालयों को स्थापित करने की मांग की गई थी। जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी कर इस मामले में पक्षकार बनाया था।

पीठ ने कहा, हाईकोर्ट को पक्षकार बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वे पर्यवेक्षी अथॉरिटी हैं। याचिकाकर्ता, एनजीओ नेशनल फेडरेशन ऑफ़  सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस और अन्य की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने पीठ के समक्ष कहा, 2020 में शीर्ष अदालत के निर्देश के बावजूद कई राज्यों ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। भूषण ने कहा कि ये ‘ग्राम न्यायालय’ ऐसे होने चाहिए कि लोग वकील के बिना अपनी शिकायतें व्यक्त कर सकें।

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सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों पर लगाया जुर्माना

सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 में राज्यों को 4 सप्ताह के भीतर ‘ग्राम न्यायालय’ स्थापित करने के लिए अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया था। और सभी हाईकोर्ट को इस मुद्दे पर राज्य सरकारों के साथ परामर्श की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कहा था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया था कि सामाजिक, आर्थिक कारणों से किसी को न्याय हासिल करने के अवसरों से वंचित नहीं होना पड़े।

सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना के संबंध में जवाब न देने वाले राज्यों (असम, चंडीगढ़, गुजरात, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल ) की सरकारों पर 1-1 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया था। इसके साथ ही न्यायालय ने राज्यों को एक माह के भीतर ग्राम न्यायालयों की स्थापना करने और इस संबंध में अधिसूचना जारी कर न्यायालय को सूचित करने का आदेश दिया था।

संवैधानिक लोकतंत्र में एक सबसे बड़ा खतरा अपारदर्शिता का

न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहना है कि न्यायपालिका के समक्ष कई चुनौतियां हैं और उनमें से पहली चुनौती उम्मीदों को पूरा करना है, क्योंकि हर सामाजिक एवं कानूनी विषय और बड़ी संख्या में राजनीतिक मुद्दे उच्चतम न्यायापालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘संवैधानिक लोकतंत्र में एक सबसे बड़ा खतरा अपारदर्शिता का है।’’

द्रष्टा देख रहा है कि पारदर्शी व्यवस्था से सत्त्ताधीश खतरा महसूस कर रहे हैं। सत्ताधीश और राज्य की नौकरशाही पारदर्शी व्यवस्था को बड़ी अदालतों से ग्राम न्यायालय की ओर लाने की इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे हैं। भ्रष्ट नौकरशाहों  धनाढ्य वर्ग और इनसे जुड़े पेशेवरों को ‘संवैधानिक लोकतंत्र ’ में अपरादर्शी व्यवस्था ही फलने-फूलने का अवसर दे रही है।

क्रमश: जारी है…

रविकांत सिंह
(मुख्य संपादक :द्रष्टा )
drashtainfo@gmail.com
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