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गणतंत्र का धर्म और श्रीराम की इच्छा

”मेरे बाद अपने-अपने समय पर शासन करने वाले लोगों से रामचन्द्र आप सभी को प्रणाम करते हुए याचना करता है कि धर्म एक सेतु की तरह है। यही सभी प्राणियों को जोड़कर रखा है। आप सभी अपने-अपने समय में इस धर्म का पालन करना अर्थात् रक्षा करना”।
दुनिया के प्रत्येक देश अपनी कला, संस्कृति और उपलब्धियों पर गर्व करते हैं। कला संस्कृति और उपलब्ध्यिों को याद करना तभी महत्वपूर्ण है जब त्रुटियों सहित अतीत में घटी ऐतिहासिक घटनाओं के साथ इन्हें याद किया जाए। सत्य को स्वीकार किए बगैर धर्म हो या संस्कृति अपना मूल्य खो देती है। धर्म, कला और संस्कृति को संरक्षित करती है राजनीति। और राजनीति का यही प्रमुख कार्य भी है। जिस देश की राजनीति धर्म, कला और संस्कृति को रक्षित करने में सफल रही है उसी देश का अस्तित्व कायम है।
भारत के लोगों ने तमाम आक्रांताओं के हमले और उनकी गुलामी के दंश झेलने के बाद भी अपने धर्म, कला और संस्कृति की रक्षा करने में सफल रहे है। 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद अव्यवस्थित, संसाधनहीन भारत के पास यदि कुछ था तों वह विलक्षण प्रतिभाओं से युक्त महामानवों का मार्गदर्शन व बुद्धि और विवेक से युक्त जनसमूह। महामानवों के मार्गदर्शन में अपने बुद्धि व विवेक के प्रयोग से जनसमूहों ने अपने धर्म, कला और संस्कृति की रक्षा के लिए लोकतंत्र की स्थापना की। और 26 जनवरी 1950 को भारत अपना संविधान लागू कर एक गणतांत्रिक देश बना। और भारत की राजनीति ने गणधर्म को अपनाया जो धर्मनिरपेक्ष है।
राजनीतिक दल की मान्यता को रद्द कर देनी चाहिए
धर्म की मूल आत्मा न्याय, कर्त्तव्य एवं औचित्य का समर्थन करती हैं प्रथा परम्पराएँ तो धर्म के आवरण मात्र हैं। जिन्हें समय-समय पर बदले जाने की आवश्यकता पड़ती हैं। गणधर्म के अलावा भारतीय राजनीति का कोई अन्य धर्म नहीं है। हिन्दु धर्म, मुस्लिम धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिक्ख धर्म, इसाई धर्म, गुरुधर्म, पितृ धर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, भ्रातृ धर्म, ग्राम धर्म, नगर धर्म आदि अनेक धर्म भारतीय गणधर्म में स्वीकृत हैं। इसलिए भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।
यदि कोई राजनीतिक दल उपरोक्त में से किसी विशेष धर्म या जाति के लिए राजनीतिक दल बनाता है या अन्य किसी धर्म के सहारे राजनीति करता है तों, वह दल भारतीय संविधान के अनुसार गणधर्म का विरोधी है। चुनाव अयोग को उस राजनीतिक दल की मान्यता को रद्द कर देनी चाहिए।
राजनीति स्वयं में एक धर्म है। प्रथा और परम्पराएं जो धर्म के आवरण मात्र हैं इनके सहारे राजनीति नहीं करनी चाहिए। इन धर्म के आवरण से राजनीति सर्वोच्च राजधर्म है। जब प्रथा और परम्पराएं समाज के पोषण की बजाय शोषण का कारण बनने लगती हैं तो राजनीति ही प्रथा और परम्पराओं में बदलाव करती है या उन्हें समाप्त कर देती है।
गण और तंत्र का टकराव
आजादी के 76 वर्ष बीत चुके हैं और भारत तथकथित भौतिक विकास के पथ पर दौड़ रहा है। आज भारत की राजनीति प्रथा और परम्पराओं वाले धर्म की बैशाखी पर लंगड़ा रही है। धर्म की इसी बैसाखी का विरोध युगद्रष्टा सरदार भगत सिंह ने किया था। जब राजनीति, धर्म की बैसाखी के सहारे चल रही हो तो, गण और तंत्र का टकराव निश्चित है। कारण, राजनीति का लक्ष्य सत्ता हासिल करने से है और सत्ता पर कोई व्यक्ति विशेष ही काबिज होता है। उस विशेष व्यक्ति का धर्म कुछ भी हो सकता है। व्यक्ति के स्वार्थ से उपजी महत्वकांक्षाएं उसे सत्ता पर सदैव बने रहने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। व्यक्ति सत्ता पर काबिज रहने के लिए धर्म की इस बैसाखी को हथियार भी बना सकता है। धर्म की बैसाखी के सहारे चलने वाली इस राजनीति का फिर भविष्य क्या होगा?
प्रथा और परम्पराओं वाला यह धर्म जब राजनीति के साथ घुलमिल जाता है तब वह एक घातक विष बन जाता है। और फिर यह विष धीरे-धीरे परिवार व समाज में घुलकर प्रथा और परम्पराओं के बर्चस्व के लिए भाई को भाई से लड़ाता है। सामाजिक व्यक्तियों के हौसलों को पस्त कर देता है। उनकी दृष्टि धुंधली होने लगती है। असली दुश्मन की पहचान कर पाना मुश्किल हो जाता है। जनता के जुझारु मन:स्थिति को कमजोर कर देता है। सोचने- समझने की बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि का नाश होने से विवेक मर जाता है। विवेक के जाने से व्यक्ति का पूर्णत: नाश हो जाता है। और इस तरह देश को साम्राज्यवादी साजिशों की आक्रमणकारी योजनाओं का लाचार शिकार बना देता है।
घुलमिल विष से भावी पीढ़ीयों को दूर रखने की सलाह
आजादी के क्रान्तिवीरों ने धर्म और राजनीति के घुलमिल विष से भावी पीढ़ीयों को दुर रखने की सलाह दी थी। और वे जब तक जीवीत रहे तब तक अपनी राजनीति में इस विष को घुलने नहीं दिया। हिन्दु धर्म शास्त्र व्यक्ति को पुरुषार्थी होने की बात करता है। नास्तिक भगत सिंह ने कहा है कि पुरुषार्थ के लिए किसी बैसाखी का सहारा नहीं लेना चाहिए।
द्रष्टा देख रहा है कि आज भारत की दलगत राजनीति धर्म की बैसाखी के सहारे खड़ी है। खासकर, स्वयं को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी हिन्दु धर्म की बैसाखी के सहारे ही खड़ी है। यदि इस बैसाखी को जनता छीन ले तो यह पार्टी, लड़खड़ाकर गिर जायेगी। बीजेपी का जन्म ही हिन्दु धर्म नाम की इसी बैसाखी के साथ हुआ है। इसी के साथ रेंगती, लड़खड़ाती, गिरती, संभलती है। और टहलते हुए आज दौड़ रही है। इस बैसाखी से बीजेपी का राजनीतिक मोह स्वाभाविक है। परन्तु, गण और तंत्र इससे क्यों मोहित हैं? पुरुषार्थ छोड़कर इस बैसाखी के सहारे क्यों दौड़ना चाहते हैं? यदि उनकी आस्था धर्म में है तो, उस धर्म का स्वरुप क्या है?
श्रीरामचन्द्र की अन्तिम इच्छा
द्रष्टा उस धर्म की बात कर रहा है जो एक दूसरे को जोड़ता है। भावी पीढ़ियों से प्रभु श्रीरामचन्द्र ने अपनी अन्तिम इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था-
भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला
नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्र:।
सामान्योऽयं धर्मसेतुर्नृपाणा:
काले काले पालनीयो भवद्भि:।।
इसका तात्पर्य है कि मेरे बाद अपने-अपने समय पर शासन करने वाले लोगों से रामचन्द्र आप सभी को प्रणाम करते हुए याचना करता है कि धर्म एक सेतु की तरह है। यही सभी प्राणियों को जोड़कर रखा है। आप सभी अपने-अपने समय में इस धर्म का पालन करना अर्थात् रक्षा करना।
भगवान श्रीराम ने जिस धर्म की रक्षा करने के लिए कहा है क्या आज उस धर्म की रक्षा राजनेता, शासन-प्रशासन और आमजन कर रहे हैं? क्या राम मन्दिर के नाम पर बनी सरकार में तंत्र (शासन-प्रशासन) के लोग, गण (जनता) के साथ जुड़कर अपना कर्तव्य ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं? देश को स्वतंत्र हुए 74 साल बीत चुके हैं। भारत का धर्म गणधर्म है। जिसके कारण अलग -अलग धर्म-संप्रदाय के नागरिक राष्ट्रप्रेम की भावना के साथ एक दूसरे से जुड़े हैं। लेकिन हिन्दु धर्म की बैसाखी के सहारे चल रही वर्तमान बीजेपी की राजनीति ने इस गण और तंत्र के बीच के सेतु को तोड़ दिया है।
गण और तंत्र के बीच टकराव शुरु हो गये हैं। राजनीति को साधने के चक्कर में परम्पराएं टुट रही हैं और परम्पराओं को साधने के चक्कर में राजधर्म छुट रहा है। राम की इच्छा के विरुद्ध तंत्र के आचरण पर विरोध करने की बजाय जनता उनके मायाजाल में फंसती चली जा रही है।