संविधान का गला घोंट रहा सत्ता और कारपोरेट का गठजोड़

भारत में कृषि और खनिज सम्पदा से परिपूर्ण भूमि पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में है। किसान की मेहनत खून पसीने से सिंची जमीनों पर सत्ता और पूंजीवादियों की क्रूर नज़र हमेशा पड़ती रही है। उन्हें जब जरुरत होती है वह सत्ता के साथ गठबंधन कर हड़प लेते हैं। वे नियमों को ताख पर रख मनमाफिक कानून बना लेते हैं।

DrashtaNews
संपादक -रविकांत सिंह

प्रकृति पुरुष बनाम राक्षसी प्रवृत्ति – 2

भारतीय संविधान देश के नागरिकों की आत्मा है। गणतंत्र भारत में किसी ने नहीं सोचा था की एक दिन भारत सरकार ही संविधान की अवमानना करेगी। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इसी संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य हैं। परन्तु, गणतंत्रता के बाद बेईमान राजनेताओं और पूंजीवादियों के गठजोड़ ने संविधान का गला घोंट कर अपनी सत्ता स्थापित की है।

साल 1992 में संविधान के 73  वे संशोधन में पंचायतीराज को संविधान की 11 वीं अनुसूची में शामिल किया गया। देश जल्द विकास करे इसलिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण कर ग्राम सभा को संवैधानिक अधिकार दिए गए। इस प्रकार त्रिस्तरीय पंचायती राज तीसरी सरकार कहलाई।

यह संशोधन ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ है, विशेषकर महिलाओं और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण में। हालांकि, कुछ राज्य अभी भी पूर्ण शक्तियां नहीं सौंपे हैं। इसके बाद पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) लाया गया, जो अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को विशेष अधिकार देता है, लेकिन यह संवैधानिक संशोधन नहीं है। 73वां संशोधन पंचायती राज के अधिकारों का आधार स्तंभ है।
बीजेपी समर्थित एनडीए की सत्ता और पूंजीवादियों को पंचायतीराज खटक रहा है। देश की 70 प्रतिशत आबादी ग्राम पंचायतों में रहती है। भारत में कृषि और खनिज सम्पदा से परिपूर्ण भूमि पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में है। किसान की मेहनत खून पसीने से सिंची जमीनों पर सत्ता और पूंजीवादियों की क्रूर नज़र हमेशा पड़ती रही है। उन्हें जब जरुरत होती है वह सत्ता के साथ गठबंधन कर हड़प लेते हैं। वे नियमों को ताख पर रख मनमाफिक कानून बना लेते हैं।

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आदिवासियों की जमीन, आजीविका और स्वशासन को मजबूत करने के लिए अधिनियम, 2006 (FRA) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) जैसे कानून बने थे। लेकिन न कानूनों को कमजोर कर राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के नाम पर मोदी सरकार ने वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023 (FCA 2023) बनाया। इस अधिनियम से सत्ता ने आदिवासियों और पंचायतों के अधिकारों का दमन कर दिया। सत्ता और पूंजीवादियों के इस गठबंधन से उत्पन्न (FCA 2023) अधनियम से लगभग 1.99 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र सत्ता ने पूंजवादियों को दे दिया।

ग्राम सभा से नहीं ली सहमति –
FRA और PESA के तहत ग्राम सभा को भूमि उपयोग पर अंतिम निर्णय का अधिकार है (फ्री, प्रायर एंड इन्फॉर्म्ड कंसेंट – FPIC)। लेकिन FCA 2023 की छूटें (जैसे सीमा क्षेत्रों में 100 किमी तक सड़कें, रक्षा बुनियादी ढांचा, इको-टूरिज्म, चिड़ियाघर) बिना ग्राम सभा की मंजूरी के लागू होती हैं, जिससे आदिवासी स्वशासन कमजोर होता है।

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मोदी की सत्ता ने वन क्षेत्र को संरक्षण से बाहर कर अम्बानी और अडानी ग्रुप जैसे कारपोरेट घरानों को असंवैधानिक तरीके से सीधा फायदा पहुँचाया। जिससे देश में विस्थापन, भूमि हड़पने और सांस्कृतिक हानि बढ़ी है। 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों ने इन मुद्दों को उजागर किया है, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं आया। 2006 (FRA) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) जैसे अधिनियम अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) को सुरक्षा देता है।

द्रष्टा जानना चाहता है कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के नाम पर बना यह वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023 (FCA 2023) किस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा करेगा ? 1.99 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र के पेड़ों को काटकर , इन वन क्षेत्रों में निवास करने वाले पशु – पक्षियों का आशियाना छीनकर, पर्यावरण को प्रदूषितकर, लोगों की साँसे छीनकर सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास करेगी। आखिरकार सरकार ने संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्ति के जीवन का अधिकार छीनने वाला कानून क्यों बनाया होगा ? यह अल्पमत तबके के गरीब, शोषित अजागरूक नागरिकों से स्वाभिमान, स्वास्थ्य और जमीन सहित उसका सबकुछ छीन लेने के लिए वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023 जैसे कानून बनाये गए।

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1. आदिवासी भूमि अधिकारों पर प्रभाव

वन की परिभाषा का संकुचन: अधिनियम की धारा 1A ने “वन” की परिभाषा को केवल नोटिफाइड या सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज क्षेत्रों तक सीमित कर दिया, जो 25 अक्टूबर 1980 या 12 दिसंबर 1996 से पहले के गैर-वन उपयोग को छूट देता है। इससे आदिवासियों के पारंपरिक समुदायिक वन, पवित्र वन और उपयोग भूमियां असुरक्षित हो गईं, क्योंकि ये क्षेत्र अब केंद्रीय स्वीकृति के बिना विकसित किए जा सकते हैं। परिणामस्वरूप, FRA के तहत मान्यता प्राप्त अधिकार (जैसे निवास और खेती) प्रभावित होते हैं, जिससे विस्थापन का खतरा बढ़ा।

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ग्राम सभा की सहमति की अनदेखी: FRA और PESA के तहत ग्राम सभा को भूमि उपयोग पर अंतिम निर्णय का अधिकार है (फ्री, प्रायर एंड इन्फॉर्म्ड कंसेंट – FPIC)। लेकिन FCA 2023 की छूटें (जैसे सीमा क्षेत्रों में 100 किमी तक सड़कें, रक्षा बुनियादी ढांचा, इको-टूरिज्म, चिड़ियाघर) बिना ग्राम सभा की मंजूरी के लागू होती हैं, जिससे आदिवासी स्वशासन कमजोर होता है। उदाहरण: महाराष्ट्र के वाधवान पोर्ट प्रोजेक्ट (2024) में 51,991 आपत्तियों को नजरअंदाज कर मंजूरी दी गई, जिससे मछुआरों और आदिवासियों की आजीविका प्रभावित हुई।

भूमि हड़पना और विस्थापन: अधिनियम से रक्षा, रेलवे और वाणिज्यिक प्रोजेक्ट्स के लिए वन भूमि आसानी से उपलब्ध हो जाती है, जिससे आदिवासी परिवारों का जबरन बेदखली बढ़ी। तेलंगाना के चिंतागुप्पा रिजर्व फॉरेस्ट में COVID काल के दौरान बिना सहमति के विस्थापन इसका उदाहरण है। 2023-2025 तक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 52 स्थलों पर अध्ययन से पता चला कि छूटों से FRA-मान्यता प्राप्त भूमियों पर भी विस्थापन हुआ।

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2. आजिविका और सांस्कृतिक अधिकारों पर प्रभाव

FRA के उल्लंघन: FRA की धारा 3(1)(a) और 4(1) आदिवासियों को वन भूमि पर निवास और उत्पादों (जैसे लघु वन उपज) का अधिकार देती है, जो गैर-बाधक (non-obstante) क्लॉज से संरक्षित है। लेकिन FCA 2023 इससे टकराती है, क्योंकि यह FRA-मान्यता प्राप्त भूमि पर भी निर्माण (जैसे पक्का घर) के लिए केंद्रीय मंजूरी मांगती है। इससे आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक आजीविका (खेती, चराई) खतरे में है।
PESA और पांचवीं अनुसूची का कमजोर होना: अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत शासन सुनिश्चित करती है। अधिनियम की धारा 4 केंद्र को निर्देश जारी करने का अधिकार देती है, जो PESA के ग्राम सभा-केंद्रित मॉडल को नजरअंदाज करती है। इससे आदिवासी समुदाय विकास परियोजनाओं से बाहर हो जाते हैं, जिससे आर्थिक असमानता बढ़ती है।
मौलिक अधिकारों का हनन: अनुच्छेद 14 (समानता), 21 (जीवन और आजीविका) और 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन होता है, क्योंकि अधिनियम बिना मुआवजे के भूमि छीन लेता है। विशेष रूप से, उत्तर-पूर्व भारत में सीमा छूटों से आदिवासी क्षेत्र प्रभावित हैं।

………………….जारी है

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