नई दिल्ली। सत्य धर्म के लिए लड़ रहे कोटद्वार के सत्याग्रही जिम संचालक मोहम्मद दीपक कुमार को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। सोमवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उनके खिलाफ दर्ज FIR पर आगे की कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी।
यह मामला बजरंग दल के सदस्यों और एक मुस्लिम दुकानदार के बीच हुए कथित विवाद से जुड़ा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दीपक की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए जवाब के लिए चार सप्ताह का समय दिया। कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के प्रभाव और संचालन पर भी रोक लगा दी, जिसके तहत दीपक को घटना और मामले से जुड़े सोशल मीडिया संदेश या वीडियो पोस्ट करने से रोका गया था।
कैसे शुरू हुआ मामला?
दीपक के लिए पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि 26 जनवरी को कोटद्वार में बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ता मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की कपड़े की दुकान पर पहुंचे थे। उन्होंने दुकान के नाम ‘बाबा गारमेंट्स’ को लेकर आपत्ति जताई थी। उन्होंने दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने की मांग की थी। उसी मार्केट में ‘हल्क जिम’ चलाने वाले दीपक कुमार ने इस मामले में बीच-बचाव किया।
दीपक बने मोहम्मद दीपक
सिंघवी ने जजों को बताया कि दीपक ने एक सभ्य नागरिक होने का फर्ज निभाया। उन्होंने ‘बाबा गारमेंट्स’ नाम का बचाव किया। दीपक ने सिर्फ यही कहा था कि दुकान कई साल से इसी नाम से चल रही है। इसलिए, नाम बदलने का दबाव बनाना गलत है। बहस के दौरान जब कुछ लोगों ने दीपक से उनकी पहचान पूछी। तब उन्होंने कहा, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
गणतंत्र दिवस पर हुई इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। सिंघवी ने कहा कि दीपक ने घटना को लेकर खुद शिकायतें दर्ज कराई थीं, लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं हुई और उनके खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर दी गई। उन्होंने सवाल उठाया, “एक अच्छे नागरिक को इस तरह की शिकायत का सामना क्यों करना पड़े?”
सिंघवी ने FIR में लगाए गए दंगाई संबंधी आरोप और सोशल मीडिया पर रोक को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि लगाए गए अपराधों में सात साल से कम की सजा है, इसलिए अर्नेश कुमार के दिशानिर्देश लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एफआईआर से जुड़ी कार्यवाही और हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट पर लगी पाबंदी भी शामिल है।

दीपक के खिलाफ केस
घटना के बाद दोनों पक्षों ने पुलिस में शिकायत की। बजरंग दल के लोगों की शिकायत थी कि दीपक और उनके एक साथी ने दंगा भड़काने की कोशिश की। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया। दीपक ने केस रद्द कराने और सुरक्षा की मांग को लेकर उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।
हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत
दीपक ने एफआईआर रद्द करने के साथ ही पुलिस की भूमिका की जांच की मांग भी की थी। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने दीपक को सोशल मीडिया पर बयान देने से बचने और जांच में पुलिस का सहयोग करने का भी निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम राहत
हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दीपक कुमार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में आगे की कार्रवाई और पुलिस जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसमें दीपक को मामले को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से रोका गया था।


